अध्याय तीन
अर्जुन असमंजस में है। युद्ध नहीं करने का विचार अभी भी उसके मन में चल रहा है। योग
बहुत ही गहन विषय है। कर्मयोग के साथ-साथ इस अध्याय में यज्ञ का भी विस्तारपूर्वक वर्णन
है। प्रकृति यज्ञमय है। इस नियम को धारण करने से ही हम प्रकृति की महाधारा से जुड़ सकते
हैं। अर्जुन के प्रश्नों से इस अध्याय का आरंभ होता है।
ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ जनार्दन,
घोर कर्म करे क्यों अर्जुन?
एक बात को केशव कहिए,
मेरे मन का भ्रम मिटाइए। - 1-2
ज्ञान से संबंधित बातें सुनने के बाद अर्जुन ने भगवान् से कहा कि यदि ज्ञान ही श्रेष्ठ है, तो
मुझसे युद्ध जैसा भयंकर कर्म क्यों करवा रहे हो? कोई एक निश्चित मार्ग मुझे बताइए। ज्ञान
और कर्म हमें एक ही दिशा में ले जाते हैं। भगवान् बुद्ध ज्ञान की शिला पर बैठ गए और 35
वर्ष तक अथक कर्म में भी लगे रहे। विवेकानंद ने कर्मयोग का पथ चुना, उनका ज्ञान भी उच्च
कोटि का था। अपनी मनोभूमि और परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए किसी भी एक पथ का
चुनाव किया जा सकता है।
गुरु गोविंद सिंह के कहने पर बंदा बैरागी ने भजन-पूजन का मार्ग त्यागकर तलवार उठाई और
अपनी सारी शक्तियाँ धर्मयुद्ध में लगा दीं। उस समय राष्ट्र को अर्जुन जैसे योद्धाओं की आवश्यकता थी। जो भी आजादी के धर्मयुद्ध में शामिल हुआ, उसी का नाम इतिहास में
स्वर्णिम अक्षरों में अंकित हो गया।
आज के धर्म की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हम न तो कर्मयोगी रहे और न ज्ञानयोगी।
केवल धर्म के बाह्य आडंबर से चिपक गए हैं। प्रवचन देने वालों की भीड़ लगी है, परंतु उनमें
ऋषि दयानंद जैसा कोई नहीं दिखाई पड़ रहा है। आज की परिस्थितियों में राष्ट्र को
कर्मयोगियों की सबसे बड़ी आवश्यकता है। अर्जुन के प्रश्नों का उत्तर देते हुए भगवान् बोले –
कर्मयोग योगी की निष्ठा,
ज्ञानयोग ज्ञानी की निष्ठा। - 3
कर्मत्याग से मिले न सिद्धि,
निष्काम कर्म से होती मुक्ति। - 4-5
हे अर्जुन! संसार में दो तरह की निष्ठा अर्थात् दृढ़ता वाले लोग होते हैं। योगी कर्मयोग के द्वारा
और ज्ञानी ज्ञान के द्वारा सिद्धि प्राप्त करते हैं। कर्मत्याग से योग को सिद्ध नहीं किया जा सकता
है। कर्म ही जीवन की कुंजी है। धर्म के नाम पर निठल्लापन किसी भी व्यक्ति, समाज और राष्ट्र
को कमजोर कर देता है। अध्याय दो में श्लोक 11 से 72 तक अर्जुन ने ज्ञानयोग को जाना।
बिना ज्ञान के कोई भी व्यक्ति सच्चा कर्मयोगी नहीं हो सकता। ज्ञान का अर्थ है अपने वास्तविक
रूप का बोध होना। ज्ञान से ही मनुष्य कर्मयोग के पथ पर अडिग रह सकता है। बिना ज्ञान के
संन्यास और कर्मयोग कभी भी डगमगा सकते हैं। आज इसी भूल ने धर्म पर गहरी चोट की है।
लोगों की धार्मिक आस्था पर दिखाऊ धर्म के कारण गहरा आघात लगा है। जो जगद्गुरु
शंकराचार्य, महर्षि रमण, श्री रामकृष्ण परमहंस और महर्षि दयानंद की तरह ज्ञानी और
तपस्वी हों, उन्हें ही धर्मगुरु कहलाने का अधिकार होना चाहिए।
श्लोक 4 में भगवान् ने निष्काम कर्म को मुक्ति का साधन कहा है। बार-बार पढ़ने से मन में यह
विचार आ ही जाता है कि निष्कामता क्या है? दुःख, बंधन और सीमाबद्ध हो जाने का
एकमात्र कारण कर्म में आसक्ति ही है। आसक्ति तभी छूटेगी जब मन ध्यान करते-करते प्रकृति
की महाधारा से जुड़ जाएगा। इसके पश्चात् योगेश्वर अर्जुन को कहते हैं कि हठपूर्वक इंद्रियों का
नियंत्रण नहीं हो सकता और कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना ही श्रेष्ठ है।
मूर्ख बल से इंद्रियाँ रोकते,
मन में उनका चिंतन करते।
मन से होता इंद्रिय नियंत्रण,
कर्मयोग ही श्रेष्ठ आचरण। - 6-7
नित्य कर्म का त्याग नहीं संभव,
कर्म किए बिन जीवन असंभव। - 8
इंद्रियों को बलपूर्वक नियंत्रण करने से मन में भोग भावों का चिंतन बना रहता है। परमात्मा
ने हमारी इंद्रियों में अनंत शक्तियाँ भर दी हैं। यह शक्ति छलकने, बिखरने व नष्ट नहीं होने दी
जाए। इसका उपाय केवल योग ही है। यदि दो-चार घंटे प्रतिदिन कुछ वर्षों तक अनुशासन में
रहकर ध्यान किया जाए, तो इंद्रियों की शक्ति मन के साथ एक होकर ऊर्ध्वगामी हो जाती है। फिर इंद्रिय नियंत्रण सहज हो जाता है। उसके लिए सोचने-विचारने की आवश्यकता नहीं
रहती है।
श्लोक 7 और 8 में योगेश्वर फिर से कर्मयोग की याद दिलाते हैं। कर्म किए बिना ज्ञान और
भक्ति में गति नहीं आती है। आज धर्म में ऐशो-आराम और कर्महीनता घुस गई है। भाषण,
उपदेश देने वाले महात्माओं की बाढ़ आ गई है। इतने महात्मा, संन्यासी यदि कर्मयोगी होते,
तो सामाजिक मूल्यों में इतनी अधिक गिरावट नहीं आती। भोले-भाले लोग धर्म के नाम पर
अपनी गाढ़ी कमाई और समय लगाते हैं। कुछ चंद लोग धर्म के नाम पर इनका शोषण करते
रहते हैं। भगवान् कृष्ण, भगवान् बुद्ध, गुरु नानक देव का पूरा जीवन कर्मयोग का उदाहरण है।
आजकल धार्मिक कहलाने वाले लोगों में कर्महीनता और ऐशो-आराम देखने को मिलता है।
जागरूकता की कमी के कारण हम लोगों को भी चमक-दमक वाले और चमत्कारी गुरु ज्यादा
अच्छे लगते हैं।
गुरु ने दारुचीरिय को यज्ञ के लिए समिधाएँ लाने के लिए कहा। दारुचीरिय ने कहा कि
भगवान् मुझे कर्म करने की कोई आवश्यकता नहीं है। मैं सिद्ध योगी हो चुका हूँ। गुरुजी शिष्य
के अहंकार को समझ गए। उन्होंने शिष्य को कहा कि एक बार गौतम बुद्ध के दर्शन करने चले
जाओ। दारुचीरिय अनाथपिण्डक के जैतवन विहार में पहुँचे, तो पता चला कि भगवान् बुद्ध
भिक्षाटन के लिए श्रावस्ती गए हैं। दारुचीरिय आश्चर्यचकित रह गए। इतने भिक्षुओं के रहते
भगवान् बुद्ध को भिक्षाटन की क्या आवश्यकता पड़ी है। दारुचीरिय श्रावस्ती की ओर ही चल
पड़े। भगवान् बुद्ध ने दारुचीरिय को समझाते हुए कहा-“जो एक बार में केवल एक ही कर्म में
इतना तल्लीन हो जाता है कि उसकी दूसरी इंद्रियों का भाव ही शेष नहीं रह जाता, ऐसा
कर्मयोगी ही सच्चा अनासक्त होता है।” दारुचीरिय को अपनी भूल का पता चल गया और वह
कर्मयोग की शिक्षा लेकर लौटा। आगे के श्लोकों में योगेश्वर यज्ञ के विषय में बताते हैं।
यज्ञ कर्म कर कुंतीनंदन,
यज्ञ बिन जीवन होता बंधन। - 9
ब्रह्मा ने रचाई यज्ञमय सृष्टि,
यज्ञ से होती सबकी पुष्टि। - 10-11
देवता करेंगे धन प्रदान,
जनसेवा में कर दो दान। - 12
अपने लिए ही पापी खाते,
पाप का भक्षण पापी करते। - 13
यज्ञ से होती है बरसात,
यज्ञीय भाव करें आत्मसात। - 14
श्लोक 9 से 14 तक योगेश्वर ने यज्ञ का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। वेद, उपनिषद्, रामायण
और महाभारत में भी यज्ञों की महिमा का वर्णन है। हवनकुंड में किए जाने वाले यज्ञ का
अपना विशेष महत्त्व है। कोई भी पदार्थ वायुभूत होकर सूक्ष्म और व्यापक हो जाता है। ऋषि दयानंद ने सत्यार्थप्रकाश के तृतीय समुल्लास में होम के लाभ, उद्देश्य, विधि आदि का
विस्तारपूर्वक वर्णन किया है।
प्रकृति में यज्ञ का नियम अटल है। पूरा ब्रह्माण्ड यज्ञ के सिद्धांत पर सुसंचालित है। खगोलीय
पिंड एक दूसरे को अनंत ऊर्जा निरंतर प्रवाहित करते रहते हैं। पेड़-पौधे, नदियाँ, कृमि, कीटक
सब अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार सृष्टि यज्ञ में योगदान देते हैं।
सृष्टि का राजकुमार मनुष्य यदि यज्ञमय कर्म न करे, तो घोर संकट खड़ा हो जाएगा। हमारे
कर्म यज्ञीय भाव के बिना योग का रूप नहीं ले सकते। यज्ञ का अर्थ है, सबके कल्याण की
भावना। अपने से पहले औरों के हित की चिंता करने वाला ही योगी हो सकता है। भगवान्
योग को अलग-अलग तरीके से बता रहे हैं। पहले समता को योग बताया और कर्मों में
कुशलता को भी योग कहा। कामना त्याग और इंद्रिय नियंत्रण पर भी बहुत जोर दिया और
अब यज्ञ को श्रेष्ठ कर्म कह दिया। हम कहीं से भी एक शुरुआत कर दें, मंजिल तो फिर मिल ही
जाएगी। ये सभी बातें परस्पर विरोधी न होकर एक दूसरे की पूरक हैं।
भगवान् यज्ञ का आधार कर्म को ही बता रहे हैं। हवन कुंड में किया जाने वाला यज्ञ तो आज
भी प्रचलित है। परंतु हमारे कर्म यज्ञमय नहीं रहे। प्रकृति के यज्ञ के विरुद्ध चलकर हम सुखी
नहीं रह सकते। रिश्वतखोरी, कामचोरी, भ्रष्टाचार, आपाधापी, बच्चियों के साथ अमानुषिक
व्यवहार, प्रकृति का दोहन, एक दूसरे का शोषण आदि कर्म करने वाले राक्षस हैं, क्योंकि
इनसे प्रकृति के यज्ञ में विघ्न पड़ता है। रावण और उसके अनुचर ऋषियों के यज्ञ में विघ्न डालते
थे और हम तो सीधे-सीधे परमात्मा के यज्ञ में ही विघ्न डाल रहे हैं। प्रकृति के यज्ञ में विघ्न
डालने से आज सारा विश्व प्राकृतिक असंतुलन से अनेक कष्टों का सामना कर रहा है।
श्लोक 11 में कहा गया है कि यज्ञ से देवता प्रसन्न होते हैं। हमारे चारों ओर की सूक्ष्म प्राकृतिक
शक्तियाँ ही देवता हैं। अग्नि में घी जैसे सुगंधित पदार्थों और वैदिक मंत्रों के साथ यज्ञ करने से
विषैले और नकारात्मक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। प्रकृति में संतुलन होने से खूब वर्षा होती है,
जिससे धन-धान्य उपजता है और प्राणियों की पुष्टि होती है। विज्ञान ने यज्ञ के ज्ञान-विज्ञान
पर अभी शोध नहीं की है। वैज्ञानिक जब इसके सत्य को जानेंगे, तो दुनिया में एक नये युग का
सूत्रपात होगा।
यज्ञ नहीं करने वालों को भगवान् ने पापी और चोर कहा है। प्रकृति मनुष्य को चारों तरफ से
हवा, धूप, अन्न, जल, खाद्य पदार्थ आदि मुक्त हस्त से लुटा रही है। समाज के सभी लोगों के
योगदान से हमारा जीवन संभव है। फिर भी यदि हम केवल अपना पेट भरने में ही लगे रहें,
तो हमें चोर और पापी ही कहा जाएगा।
श्लोक 14 में यज्ञ का आधार कर्मयोग को बताया गया है। हवन कुंड के यज्ञ तो प्रतीक यज्ञ होते
हैं, जो घरों में केवल शुभ अवसरों पर किए जाते हैं। राजसूय, वाजपेय और अश्वमेध यज्ञ
विश्व-स्तर पर होते थे। उनका आयोजन राजा-महाराजा कराते थे। अतः यदि यज्ञ को जीवन
का अंग बनाना है, तो कर्त्तव्य कर्मों को यज्ञीय भाव से किया जाना चाहिए।
याज्ञवल्क्योपनिषद् में महर्षि याज्ञवल्क्य राजा जनक के प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहते हैं कि
यदि हवन सामग्री न मिले, तो केवल अग्नि से यज्ञ कर लो और अग्नि भी न मिले तो वनस्पति आदि पदार्थों से यज्ञ कर लो, वनस्पति भी न मिले तो जल से ही भाव यज्ञ कर सकते हैं। कहने
का तात्पर्य यही है कि हर परिस्थिति में यज्ञमय विचार और यज्ञमय कर्म संभव हैं। इसके
पश्चात् यज्ञ का ही वर्णन है।
वेदों की रचना करते ब्रह्म,
यज्ञ से अनुभव होता ब्रह्म। - 15
योगेश्वर कहते हैं कि सद्कर्म वेदों से उत्पन्न होते हैं और वेदों की उत्पत्ति अक्षर ब्रह्म से हुई है।
इससे यह सिद्ध हुआ कि यज्ञ परमात्मा में सदा से प्रतिष्ठित है। परस्पर सहयोग रूपी यज्ञीय
भाव की शक्ति ही संसार की सबसे बड़ी शक्ति है। वेद किसी कवि, महाकवि, विद्वान् और
दार्शनिक ने नहीं लिखे हैं। तप की उच्चतम भाव दशा में ये ऋषियों की आत्मा से स्वतः प्रकट
हुए हैं।
महाभारत समाप्त होने पर एक दिन अर्जुन ने भगवान् श्रीकृष्ण से कहा कि एक बार फिर से
गीता का उपदेश सुना दो। तब भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा कि उस समय मैंने अत्यंत योगयुक्त
अंत:करण से उपदेश दिया था, अब वैसा उपदेश संभव नहीं हो सकता। इसी प्रकार ऋषियों ने
भी योग की उच्चतम अवस्था में ही ईश्वरीय मन, बुद्धि से वेदों को प्रकट किया है। इसके पश्चात्
योगेश्वर सृष्टि-चक्र के अनुसार चलते हुए कर्त्तव्य कर्म करने के लिए कहते हैं।
जो नहीं चलते सृष्टि-चक्र अनुसार,
उनका जीवन हो जाता निस्सार। - 16
जिसके मन में होती है संतुष्टि,
उसको मिल जाती है मुक्ति। - 17
कर्मसिद्ध योगी के मिट जाते बंधन,
समाप्त कर देता वह स्वार्थ संबंध। - 18
परमात्मा को पाते अनासक्त लोग,
त्याग करो तुम आसक्ति भोग। - 19
श्लोक 16 हमें सृष्टि-चक्र के अनुसार चलने का निर्देश देता है। समाज में समस्याएँ तभी उठती
हैं जब मनुष्य सृष्टि के विरुद्ध आचरण करता है। अर्जुन को युद्ध के मैदान में परिवार नजर आ
रहा है। योगेश्वर उसे राष्ट्रहित में नियोजित करना चाहते हैं। हम भी परिवार में इस कदर
मोहित हो जाते हैं कि उसके लिए राष्ट्रहित को भी तिलांजलि दे देते हैं। प्रकृति के प्रत्येक नियम
को अपनाने में ही योग की पूर्णता है। भगवान् बुद्ध ने अपने जीवन में यही महाप्रयोग किया
था। हम अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह इस प्रकार करें, जिससे परिवार, राष्ट्र और विश्व का हित
साधन हो। हमारे देश के भूतपूर्व राष्ट्रपति डा. ए. पी. जे. कलाम का कथन है-“प्रकृति से प्रेम
कीजिए और उससे जुड़ी हर चीज की देखभाल कीजिए, आपको हर जगह ईश्वर मिलेगा।”
श्लोक 17 में कहा गया है कि पूर्ण सिद्ध योगी के लिए कोई कर्त्तव्य शेष नहीं रह जाता है।
कर्मसिद्ध अवस्था को पाना कोई जादूगरी नहीं है। हजारों वर्षों में कोई एक बुद्ध और
शंकराचार्य जैसा कर्मसिद्ध योगी पैदा होता है। सिद्ध योगियों का किसी से भी स्वार्थपूर्ण संबंध नहीं रहता है। उन्हें सभी में अपनेपन का आभास होता है। संसार में हम एक-दूसरे से स्वार्थ से
जुड़े होते हैं। यदि हमारे स्वार्थ की पूर्ति न हो, तो हमारी मित्रता और रिश्तों में भी दूरियाँ
आने लग जाती हैं। गुरु नानक देव, महर्षि रमण और ऋषि दयानंद जैसी कर्मसिद्ध अवस्था
जन्म-जन्मांतर के तप से आती है।
श्लोक 19 में योगेश्वर अर्जुन को आसक्ति त्यागने के लिए कहते हैं। आसक्ति मनुष्य को संकुचित
बना देती है, जिससे उसमें लोभ, लालच, स्वार्थ, अहंकार जैसे दुर्गुण आ जाते हैं। आसक्ति दूर
होते ही मनुष्य का व्यक्तित्व सागर के समान विशाल हो जाता है। भगवान् हमें तुच्छ और
संकीर्ण आसक्ति के स्थान पर उचित और विवेकपूर्ण कामनाओं को अपनाने के लिए कहते हैं।
यजुर्वेद (4.28) इसकी पुष्टि करते हुए कहता है-“हे अग्निदेव! आप हमें पाप से पूर्णत: बचाएँ।
आप सदाचार को हम यजमानों में प्रतिष्ठित करें।” इसके पश्चात् योगेश्वर कर्मयोग के विषय में
बताते हैं।
राजा जनक ने ली कर्म से सिद्धि,
कर्मयोग से होती सबकी वृद्धि। - 20
राजसुख भोगते हुए भी जनक कर्मसिद्ध योगी थे। जिनके कर्म स्वार्थ रहित होते हैं और जिनका
जप-तप, धन-दौलत लोकहित में अर्पित होते हैं, वे ही कर्मसिद्ध योग के अधिकारी होते हैं।
राजा जनक एक किसान की तरह खेती करके अपना गुजारा चलाते थे। राजपाट, खेती के
साथ-साथ वे योग, ध्यान और दर्शन में भी पारंगत थे। उनका जीवन अवश्य ही अत्यंत
श्रमशील, तपस्वी और अनुशासित रहा होगा।
प्रज्ञा पुराण में एक कथा इस प्रकार है-“शुकदेव मुनि ने राजा जनक को प्रणाम किया। शुकदेव
मुनि संन्यासी और जनक गृहस्थ थे। इस प्रतिकूल से लगने वाले आचरण पर सारी सभा
विस्मित हो उठी। शुकदेव मुनि इस बात को ताड़ गए। सभासदों का समाधान करते हुए
उन्होंने कहा कि विद्वानों! महाराज जनक ने अपने जीवन को ही योग बना लिया है। उनका
प्रत्येक कर्म भगवान् को, आदर्शों को समर्पित होता है। अतएव वे निःसंदेह सबसे बड़े योगी हैं।”
राजा जनक की तरह भगवान् कृष्ण हमें भी संसार रूपी महाभारत में कर्म करते-करते
कर्मयोग की कला सिखाते हैं।
श्रेष्ठ जन करते जैसा आचरण,
जनता करती वैसा अनुकरण। - 21
त्रिलोक में नहीं कुछ स्वार्थ,
फिर भी कर्म करूँ मैं पार्थ। - 22
छोड़ दूँ यदि मैं सावधानी,
पार्थ हो जाएगी भारी हानि। - 23
सब जन चलते मेरे अनुसार,
कर्महीनता ले आएगी विनाश। - 24
श्रेष्ठ जनों के आचरण का दूसरे लोग भी अनुसरण करते हैं। नेताओं, लोकसेवकों, विद्वानों और
धर्मगुरुओं का आचरण समाज के लिए मिसाल होना चाहिए। आजकल नेता बनने की होड़
चारों तरफ लगी हुई है। यदि जनता की सेवा इनका मकसद रहा होता, तो भ्रष्टाचार आसमान
नहीं छूता। भगवान् कहते हैं कि अर्जुन मुझे तीनों लोकों में कुछ भी नहीं चाहिए, तो भी मैं
दिन-रात कर्म में जुटा रहता हूँ। भगवान् कृष्ण राजा नहीं होते हुए भी राजाओं के भी राजा थे।
संसार के सभी सुख उनको प्राप्त थे। वे सदा पुरुषार्थी रहे और युग की सभी समस्याओं का
समाधान करते रहे। श्लोक 23-24 में योगेश्वर कहते हैं कि यदि मैं कर्म करना छोड़ दूँ और
विलासी बनकर बैठ जाऊँ, तो संसार नष्ट हो जाएगा क्योंकि सब लोग मेरे मार्ग का अनुसरण
करते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण उपदेशक नहीं हैं, उन्होंने जो कहा, वह करके भी दिखाया। भगवान्
श्रीकृष्ण को यश, नाम, बड़ाई, ख्याति की कोई आवश्यकता नहीं है। उनका तो जन्म ही
इसलिए हुआ था कि युगों-युगों तक लोग उनके आचरण से प्रेरणा लेते रहें। मानस के बालकांड
में तुलसीदास ने भी कहा है-“जग बिस्तारहिं बिसद जस रामजन्म कर हेतु।” राम के यश का
विस्तार प्रजा में प्रेरणा भरने के लिए होता है। आगे के श्लोकों में योगेश्वर महापुरुषों के कर्त्तव्य
के विषय में बताते हैं।
महापुरुष बने जन के नायक,
कर्म करें वे पुण्य, प्रेरणादायक।
ज्ञानी करें न अज्ञानी को भ्रमित,
कर्मों से करें वे सबको प्रेरित। - 25-26
हे अर्जुन! ज्ञानी निष्काम भाव से कर्म करते हैं, जबकि अज्ञानी आसक्तिपूर्वक कर्मों में लगे रहते
हैं। ज्ञानियों को चाहिए कि वे सामान्य जनों की बुद्धि को अस्थिर न करें। ऋषि दयानंद और
ऋषि विवेकानंद जैसे अनासक्त भाव से कर्म करने वाले तो कभी-कभार ही पैदा होते हैं।
संसारी लोग धन, पद, नाम आदि पाने की चाहत में ही दिन-रात श्रम करते रहते हैं। भगवान्
कृष्ण का ज्ञानियों, सिद्धों, महात्माओं और कर्मयोगियों को निर्देश है कि श्रमशील लोगों के श्रम
को निम्न और अनासक्त कर्म को उच्च कहकर संसारी लोगों की बुद्धि को विचलित नहीं करना
चाहिए। ज्ञानियों और संतों को अपने आचरण के द्वारा धीरे-धीरे इनमें राष्ट्रीयता के भाव भरने
चाहिएँ।
गीता के अनुसार जिनके लिए कोई कर्म शेष नहीं बचा, उनको भी कर्म से छूट नहीं है।
रामानुजाचार्य रचित भगवद्गीता भाष्य में वर्णित है-“जो अनासक्त और ज्ञानयोग के अधिकारी
हैं, उन्हें भी लोकरक्षा के लिए अर्थात् लोगों की भलाई के लिए कर्म करना चाहिए।” संसार में
सभी कर्मों का बराबर महत्त्व है। यदि प्रत्येक कार्य को भगवान् का कार्य समझकर किया जाए,
तो पूरा जीवन ही योग हो सकता है।
सिक्ख धर्म के पाँचवें गुरु अर्जुनदेव ने जब आश्रम में प्रवेश किया तो वे सवेरे से शाम तक
बर्तन माँजने का काम करते थे। उनकी कार्य के प्रति श्रद्धा और अनुशासित जीवन के कारण ही
गुरु रामदास जी ने उनको अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। अगले श्लोक में योगेश्वर
मूर्ख और ज्ञानी का भेद बताते हैं।
सब कर्म प्रकृति का परिणाम,
मूर्ख करते मिथ्या अभिमान। - 27
गुण कर्म तत्त्व जो जानता,
आसक्त नहीं वह योगी होता। - 28
योगेश्वर कहते हैं कि संसार में सभी कर्म प्रकृति की शक्ति से हो रहे हैं। अज्ञानी अहंकारवश
अपने को कर्मों का कर्ता समझ बैठता है। हमारी इंद्रियों में देखने, सुनने, सूँघने, सोचने आदि
की शक्तियाँ प्रकृति प्रदत्त हैं। प्राण रूपी शक्ति से हम सभी कार्य करते हैं। अतः कर्मों का कारण
प्रकृति है और हम केवल माध्यम हैं। अब प्रश्न पैदा होता है कि फिर तो संसार में जो भ्रष्टाचार,
दुराचार और पाप हो रहा है, उसका कर्ता भी भगवान् है। मछली समुद्र में पैदा होती है। उसे
जीवन जीने की शक्ति समुद्र से मिलती है, परंतु फिर भी समुद्र मछली से अप्रभावित रहता है।
यह ध्रुव-सत्य है कि संसार के सभी भले-बुरे कर्म ईश्वरीय शक्ति से ही हो रहे हैं। परंतु मनुष्य
मन और बुद्धि का प्रयोग करने में पूर्ण स्वतंत्र है। अपने विवेक से वह भले-बुरे कर्म का चुनाव
कर सकता है। मन हमारे द्वारा किए गए कर्मों के अंश को संभालकर रखता है। जिस देह में
उसका अंश है, उसी को अच्छा या बुरा फल देता रहता है। अहंकारवश हम प्रकृति की शक्तियों
को अपनी शक्ति मानकर उनका दुरुपयोग करते रहते हैं।
श्री रामकृष्ण परमहंस ने अपने अहम् को माँ काली में विसर्जित कर दिया था। वे अपनी नाक
पर हाथ रखकर कहते थे-“देखो, माँ काली साँस ले रही हैं।” दिन कब निकला, सूर्य कब अस्त
हुआ, उन्हें ध्यान में कुछ मालूम नहीं पड़ता था। माँ काली को पुष्प अर्पित करते-करते अपने
मस्तक पर भी रख लेते थे। माँ काली और श्री रामकृष्ण परमहंस दूध-पानी की तरह मिलकर
एक हो गए थे। वे कहते थे-“सब कुछ माँ करती हैं, मैं तो उनके हाथों का एक यंत्र हूँ।” समर्पण
के बिना उच्च स्तरीय योग साधना असंभव है। इसके पश्चात् योगेश्वर कर्मयोग के विषय में
बताते हैं–
अनेक शुभ कर्मों का कारण आसक्ति,
महापुरुष भरें सद्चिंतन की शक्ति।- 29
कर्मफल का तुम कर दो त्याग,
युद्ध के लिए अर्जुन हो जाओ तैयार।- 30
श्लोक 25-26 की बात को पुनः स्पष्ट करते हुए योगेश्वर कहते हैं कि संसार में आसक्तिपूर्वक
कर्मों में लगे हुए लोग भी राष्ट्रीय कल्याण और परोपकार के अनेक कार्य करते हैं। ज्ञानी पुरुषों
को उन्हें इस प्रकार का उपदेश नहीं देना चाहिए जिससे वे कर्मत्याग के नाम पर आलसी और
निठल्ले बन जाएँ। कोई कर्म शेष न रहने पर भी महापुरुषों को जनता के सामने कर्मठता का
उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए कर्म करते ही रहना चाहिए। इसी कारण बुद्ध और शंकराचार्य
जैसे महाज्ञानियों ने भी कर्म का त्याग नहीं किया।
योगेश्वर कहते हैं कि अर्जुन सभी कर्म मुझमें अर्पित करके युद्ध के लिए तैयार हो जाओ। त्याग
के बिना हमारा मन परिवार, मित्रों, रिश्तों की परिधि में बंधा रहता है। स्वामी विवेकानंद ने
अपनी आत्मकथा में लिखा है-“मैंने पारिवारिक बंधन रूपी जंजीर तोड़ डाली है और धर्मसंघ
की सोने की जंजीर मैं पहनना नहीं चाहता।”अर्जुन को भी इसी प्रकार परिवार, संबंधियों व आत्मीयजनों की जंजीर से मुक्त होकर संसार के हित में युद्ध करना है। संसार के प्रत्येक व्यक्ति
को दो प्रकार के युद्ध से गुजरना पड़ता है। एक अपने मन में दिन-रात चलने वाला द्वंद्व-युद्ध,
दूसरा संसार के घात-प्रतिघात, झंझावात और समस्याएँ। इस द्वंद्व-युद्ध में विजय पाने के लिए
प्रकृति का अनुसरण करें। इसके पश्चात् योगेश्वर श्रद्धा और समर्पण के विषय में बताते हैं–
मेरा अनुसरण करते श्रद्धायुक्त,
कर्मबंधन से हो जाते मुक्त।
जो नहीं चलते मेरे अनुसार,
उनका जीवन हो जाता निस्सार। - 31-32
योगेश्वर कहते हैं कि जो व्यक्ति छिद्रान्वेषी नहीं हैं और श्रद्धापूर्वक धर्म के नियमों का पालन
करते हैं, वे कर्म के बंधन से मुक्त हो जाते हैं। कुछ व्यक्ति गीता जैसे धर्मग्रंथों में भी कमियाँ
ढूँढ़ते हैं। भगवान् राम, कृष्ण में भी उन्हें दोष नजर आते हैं। ऐसे व्यक्तियों का भला कोई नहीं
कर सकता। वे जल्दी ही नष्ट हो जाते हैं।
संसार में एक इंच भी जगह गुण-दोष से रहित नहीं है। महासागरों में जहाँ मोती मिलते हैं,
वहीं मगरमच्छ, व्हेल जैसे खतरनाक जीव भी उनमें रहते हैं। सूर्य को जगत् की आत्मा कहा
गया है। वैज्ञानिक मानते हैं कि इसमें भी धब्बे हैं। अत: यदि हम दोष-दुर्गुण ढूँढ़ने में ही लगे रहे
तो यह संसार दोषकुंड नजर आएगा। ‘मानस’ के अरण्यकांड में भगवान् राम शबरी को नवधा
भक्ति का उपदेश देते हुए अष्टम भक्ति में कहते हैं– “सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा।” सपने में भी
पराये दोषों को नहीं देखना है।
स्वभाव वश मनुज कर्म करेगा,
हठ से जीवन नहीं चलेगा। - 33
मनुष्य का स्वभाव उसके अनेक जन्मों की देन है। एक समान परिस्थितियों में पलने वाले बच्चों
में भी जमीन-आसमान का अंतर होता है, क्योंकि वे अपना-अपना मन लेकर आए हैं। हमारे
स्वभाव का मूल कारण हमारे विचार ही हैं। जो हम सोचते हैं, वह कर्म के रूप में प्रकट होने
लगता है। कर्म धीरे-धीरे हमारी आदत, स्वभाव और संस्कार बन जाता है। स्वभाव से वशीभूत
होकर हम न जाने क्या-क्या कर बैठते हैं। बहुत पढ़े-लिखे व्यक्तियों में भी नशा और दुराचार
पाया जाता है। वे जानते हैं कि यह सब अनुचित है, परंतु वे स्वभाव से मजबूर होते हैं।
संत एकनाथ के साथ एक चोर भी यात्रा पर चल पड़ा। उसने रास्ते में चोरी न करने की
प्रतिज्ञा ली। रात के समय वह साथी लोगों का सामान उलट-पुलट कर इधर-उधर रख देता
था। एक यात्री ने रात के समय उसको पकड़ लिया। संत एकनाथ ने उससे चोरी का कारण
पूछा। उसने कहा चोरी करने की उसकी आदत पड़ गई है। सामान को इधर-उधर करने से मन
को तसल्ली मिल जाती है। संत ने सभी शिष्यों को समझाया कि हठ या बाहरी दबाव से
स्वभाव को नहीं बदला जा सकता। स्वभाव को बदलने के लिए संकल्प लेकर साधना करनी
होती है। डाकू रत्नाकर का जब विवेक जग उठा, तो उन्होंने नारद मुनि से राम-नाम की दीक्षा ली और महर्षि वाल्मीकि के नाम से जगत् विख्यात हो गए। इसके पश्चात् योगेश्वर साधना के
विघ्न के विषय में बताते हैं।
राग - द्वेष के वश मत होइए,
कल्याण पथ के ये विघ्न जानिए। - 34
योगेश्वर एक मनोचिकित्सक की भाँति हमारा मार्गदर्शन करते हुए बता रहे हैं कि यदि मन को
इंद्रियों के हाथों का खिलौना बना दिया, तो हम राग-द्वेष की भूल-भुलैया में भटकते रह
जाएँगे। अपने मन को बाहर की घटनाओं व पदार्थों के कारण लक्ष्य से नहीं भटकने देना है।
विद्यार्थी भी इसी कारण एकांत में विद्याध्ययन करते हैं।
स्वामी विवेकानंद शिकागो जाने से पहले खेतड़ी (राजस्थान) के महाराज अजीत सिंह के पास
ठहरे हुए थे। शाम के समय कुछ नर्तकियाँ आकर गाने-बजाने लगीं। स्वामी जी को अच्छा नहीं
लगा और वे उठकर अपने कक्ष की ओर जाने लगे। तभी मैनाबाई नाम की नर्तकी ने गाना शुरू
किया–
प्रभु मेरे अवगुण चित्त न धरो।
समदर्शी है नाम तिहारो,
चाहो तो पार करो.........।
यह गीत सुनकर स्वामी जी को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने मैनाबाई को माँ
कहते हुए हाथ जोड़कर माफी माँगी। इस घटना से स्वामी जी को गहरे ज्ञान और वास्तविक
योग की अनुभूति हुई थी। अब योगेश्वर स्वधर्म के लिए प्रेरणा भरते हुए कहते हैं–
अपने धर्म को निभाते मरना भी हितकारी,
पराये धर्म से जीवन हो जाता कष्टकारी। - 35
यह श्लोक हमें कर्त्तव्य-धर्म का बोध कराता है। अपने कर्त्तव्य को ईमानदारी और कुशलतापूर्वक
करना ही स्वधर्म का पालन है। कर्त्तव्य कर्मों को भारभूत और झंझट समझ कर दूसरे के कर्त्तव्य
की नकल करना ही परधर्म है।अर्जुन अहिंसा के नाम पर अपना क्षत्रिय-धर्म त्यागकर संन्यासी
हो जाता है, तो यह उसके लिए कभी भी कल्याणकारी नहीं हो सकता। धर्म का पथ सबसे
सरल है। शास्त्रों में कठिन इसलिए लिखा है क्योंकि राग-द्वेष और मोहआदि के कारण हमें उसे
अपने स्वभाव का अंग बनाने में कठिनाई आती है। किसान, मजदूर, व्यापारी, नेता, अभिनेता
आदि यदि अपने-अपने कर्त्तव्य कर्मों को धर्म समझकर करें, तो इसमें उन्हें क्या परेशानी आ
सकती है? यही स्वधर्म है। यदि हम परिवार के प्रति कर्त्तव्यों से बचने के लिए साधु का वेश
धारण कर लें और इधर-उधर भिक्षा माँगते फिरें, तो इसे निंदनीय कर्म कहा जाएगा।
प्रज्ञा पुराण में एक कथानक इस प्रकार है-“एक राजा ने संन्यासी से कहा कि राजकाज में बड़े
झंझट हैं तथा संन्यास में निश्चिंतता। आप मुझे संन्यास की दीक्षा दे दीजिए। संन्यासी ने
पूछा–राजकाज कौन करेगा? उत्तर मिला–किसी को दान कर दूँगा और अपने निर्वाह के लिए
मेहनत-मजदूरी कर लूँगा। संन्यासी ने कहा–राज मुझे दान कर दो, मेरे नौकर की तरह शासन की व्यवस्था चलाओ। कर्त्तव्य-कर्मों से पलायन मत करो। वह तो अध्यात्म दर्शन का मूल है।”
आगे के श्लोकों में अर्जुन प्रश्न पूछकर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान करते हैं।
मनुष्य पाप क्यों करता जबरन?
इसमें कौन प्रेरणा भरता भगवन्?
रजोगुण होता सब पापों का मूल,
इससे उपजते सब दोष-दुर्गुण। - 36-37
अर्जुन कहते हैं कि नहीं चाहते हुए भी मनुष्य आखिर पाप कर्म क्यों करता है? हम अपने
जबरदस्त वकील बनकर अपनी गलतियों के समर्थन में तर्क जुटाते रहते हैं। अपनी पीठ
थपथपाते हुए आजीवन गलत रास्ते पर चलते रहते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन की
चंचलता (रजोगुण) से कामनाएँ उत्पन्न होती हैं। चंचलता मन का गुण है। इस चंचलता को
सही दिशा में लगाकर श्रेष्ठ कामनाओं को जन्म दिया जा सकता है। कामनाएँ अग्नि के समान
बढ़ती ही जाती हैं। यदि तुच्छ कामनाओं की पूर्ति न हो, तो क्रोध फुफकारने लगता है। यदि ये
कामनाएँ पूर्ण हो जाएँ, तो अहंकार आ जाता है। इसी से फिर सारे दुर्गुण आ जाते हैं।
जानामि धर्मं न च मे प्रवृति:।।—दुर्योधन कहता है-“मैं धर्म को जानता हूँ, पर मेरी उसमें
रुचि नहीं है।” दुर्योधन का लोभ, लालच उसके विनाश का कारण बना। हम लोगों में भी बहुत
सारे दुर्योधन की तरह सब कुछ जानते हुए भी अनेक दुष्प्रवृत्तियों का शिकार हैं। नशा सभी
बुराइयों की जड़ है। परंतु फिर भी दिन-प्रतिदिन इसका चलन बढ़ता ही जा रहा है। इंटरनेट,
टेलीविजन पर जो देखा, बिना सोचे-विचारे उसे पाने के लिए हम अधीर हो उठते हैं। ज्ञान से
तुच्छ कामनाओं का नाश होता है। ज्ञान का उदय योग से ही होता है। त्रिशिख ब्राह्मणोपनिषद्
(2.19) में कहा गया है–
योगात्संजायते ज्ञानं ज्ञानाद्योगः प्रवर्तते।
“योग द्वारा ज्ञान की और ज्ञान द्वारा योग की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है।”अज्ञानता का कारण
बताते हुए अगले श्लोक में योगेश्वर कहते हैं–
गर्भ को ढक लेता आवरण,
अज्ञान होता दुःख का कारण। - 38
अग्नि, दर्पण और गर्भ आवृत्त हो जाने पर नजर नहीं आते हैं। इसी प्रकार हमारी आत्मा भी
कामनाओं के ढेर के नीचे दबी होने के कारण अनुभव में नहीं आती है। ईशावास्योपनिषद्
(15) का कथन है–
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये।।
“सोने के चमकदार पात्र से सत्य का मुख्य ढका हुआ है। हे पूषन! मुझ सत्याभिलाषी के लिए
उसे हटा दो।” मनुष्य की आवश्यकताएँ सीमित हैं। वह अनावश्यक कामनाओं की पूर्ति के लिए
आजीवन उनके बोझ तले दबा रहता है। सभी जीवधारी प्रकृति से आवश्यकतानुसार लेते हैं और बदले में अपनी क्षमतानुसार वापस लौटा देते हैं। यही प्रकृति का शाश्वत नियम है। इस
नियम के पालन न करने के कारण मनुष्य दुःखी रहता है। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए
योगेश्वर कहते हैं–
अग्नि समान अतृप्त कामनाएँ,
साधक को देती अनंत बाधाएँ। - 39
इंद्रियाँ, मन काम के स्थान,
इनसे बढ़ता मोह, अभिमान। - 40
कामनाएँ अग्नि के समान अतृप्त बनी रहती हैं। अग्नि को नियंत्रित न किया जाए तो सारे संसार
को राख के ढेर में बदल सकती है। कामनाओं के आवेग में मनुष्य अपना विवेक खो बैठता है।
महाभारत (आदिपर्व) में राजा शांतनु की कथा है। निषाद कन्या को पाने के लिए वे चिंता और
शोक में डूब गए। कुमार देवव्रत (भीष्म पितामह) ने आजीवन ब्रह्मचारी रहने की कठोर
प्रतिज्ञा लेकर अपने पिता की कामना की पूर्ति की। राजा ययाति और नहुष की कथाएँ भी
अतृप्त कामनाओं के दुष्परिणाम को प्रकट करती हैं।
योगेश्वर कहते हैं कि इंद्रियाँ, मन और बुद्धि ही कामनाओं के घर हैं। कामनाओं का कारण मन
है। इंद्रियाँ मन से बाहर नहीं जाती हैं। मन अपनी पर आ जाए तो बुद्धि भी काम करना बंद
कर देती है। नारद मुनि विश्वमोहिनी कन्या का हाथ देखते-देखते अपनी बुद्धि खो बैठे थे। मन
हर समय कुछ-न-कुछ करना चाहता है। हमारा मन सबसे ज्यादा शांति उस समय अनुभव
करता है, जब हम किसी की मदद करते हैं। अगले श्लोक में योगेश्वर इंद्रिय नियंत्रण का महत्त्व
बताते हैं।
मन-बुद्धि को नियंत्रित करना,
काम को अपने वश में रखना। - 41
इंद्रियों को वश में करना ही अर्जुन का प्रथम कर्त्तव्य है। कामनाओं को मन, बुद्धि और आत्मा
के बल से ही नियंत्रित किया जा सकता है। योगेश्वर के कहने का अर्थ यही है कि हम हर समय
सजग और सावधान रहें। अपने अंतर्मन और बुद्धि को टटोलते रहें। मन किसी भी समय, कहीं
भी दौड़ सकता है। महोपनिषद् के अध्याय 3 में ऋभु मुनि अपने पुत्र निदाघ मुनि को कहते
हैं–"यह तृष्णा चंचल बंदरिया के समान है, जो न लाँघने योग्य स्थान पर भी अपना पैर
टिकाना चाहती है। यह तृष्णा एक महामारी और हैजा है। इस नश्वर संसार में यह समस्त
दुःखों में दीर्घकाल तक दुःख देनेवाली है।"
निदाघ मुनि ने हजारों वर्ष पूर्व जो बात कही, वह आज के समाज पर भी पूरी तरह लागू होती
है। अतृप्त कामनाओं के कारण आज व्यभिचार, दुराचार, भ्रष्टाचार चरम पर हैं। नर-पिशाचों
की अतृप्त कामनाओं के कारण आज समाज का बहुत बड़ा वर्ग असुरक्षित महसूस कर रहा है।
लगता है इस महामारी के इलाज के लिए योग-युग में वापसी करनी होगी। अनियंत्रित मन का
नियमन ध्यान और योग से ही हो सकता है।अगले श्लोक में इंद्रियों, मन और बुद्धि की शक्ति का
वर्णन है।
इंद्रियाँ मन से अधिक प्रकाशक,
मन इंद्रियों से सूक्ष्म, व्यापक।
मन से ऊँचा बुद्धि का स्थान,
बुद्धि से परे आत्म - ज्ञान। - 42
योगेश्वर ने स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ते हुए क्रम से विकास की वैज्ञानिक विधि का वर्णन
किया है। इंद्रियाँ स्थूल हैं। इन्हें हम आँखों से देख सकते हैं। इंद्रियों से अधिक सूक्ष्म इंद्रियों के
विषय हैं। कान के सुनने की शक्ति कान से अधिक सूक्ष्म है। मन, बुद्धि, तेज, आत्मा भी क्रम से
अधिक सूक्ष्म, व्यापक और शक्तिशाली होते जाते हैं। कठोपनिषद् में यमराज ने नचिकेता को
भी इसी क्रम से आत्म-तत्त्व समझाया है। हमारा योगाभ्यास भी स्थूल से सूक्ष्म की ओर ही
चलना चाहिए। उतावलेपन में छलाँग लगाने से निराशा हाथ लगती है। अंत में योगेश्वर काम
को पराजित करने की विधि बताते हैं।
काम शत्रु है अर्जुन दुर्जय,
मन से कर तू इसे पराजय। - 43
अध्याय तीन का यह अंतिम श्लोक सारगर्भित और महत्त्वपूर्ण है। योगेश्वर कहते हैं कि
कामनाओं को जीतना कठिन है, परंतु शुद्ध मन के द्वारा काम शक्ति को नियंत्रित किया जा
सकता है। भगवान् श्रीकृष्ण ने कर्मयोग के माध्यम से जीवन के सत्य का बोध कराया है।
इंद्रियों, मन, बुद्धि और आत्मा के तालमेल से ही योग-साधना में सफलता मिलती है।
इस अध्याय का सार कर्मयोग है। हम अपने कर्मों को धर्म समझकर करने से ही कर्मयोग के
अधिकारी हो सकते हैं। संत तुकाराम महान् भक्त, ज्ञानी और कर्मयोगी थे। वे कर्म के आदि,
मध्य, अंत में भगवान् के चिंतन को ही योग कहते थे। कर्मयोग को पढ़ना, सुनना ही पर्याप्त
नहीं है। नि:स्वार्थ भाव से अपने कर्मों को सबके हित में संपादित करना ही कर्मयोग है। अर्जुन
की मनोभूमि को योग के अनुकूल पाकर योगेश्वर चौथा अध्याय आरंभ करते हैं।